बड़े समाजसेवी के अंदर का ब्राह्मणी जातिवाद का नमूना यह रहा!

उनके ‘ब्रह्मजन सुपर-100’ खोलने/खुलवाने के ऐलान पर मुझे ज्यादा अचरज नहीं हुआ! अचरज की बात ये है कि बहुजन इस विराट सच की कैसे अनदेखी करता है कि उसके वोट से चुनी सरकारें किस तरह ‘ऐसे अनेक लोगों’ को तीस-पैंतीस साल निर्णयकारी शासकीय पदों पर बिठाकर रखती हैं! चलो मान लिया कि अशिक्षा और नासमझी के चलते आम गरीबों और साधारण लोगों का बड़ा हिस्सा इस यथार्थ को नहीं समझ पाता! पर इस वर्ग या समाज के शिक्षित-समझदार लोग, ख़ासकर राजनीतिक तत्व क्या करते हैं? उत्पीड़ित समाज के लोगों को वे क्यों नहीं समझाते?

सच तो ये है कि ऐसे ‘राजनीतिक तत्व’ अपने निजी-पारिवारिक और निहित स्वार्थ से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं! इसलिए आज के इस नंगे और निरंकुश मनुवादी-अंधड़ के लिए संसदीय राजनीति का बहुजन-नेतृत्व कम जिम्मेदार नहीं है! यूपी और बिहार के नेता सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, जहां तीन दशक पहले जबर्दस्त जनजागरण का आगाज़ हुआ था! पर कैसी विडम्बना है, ये दोनों बड़े सूबे आज ‘मनुवादी हिंदुत्वा’ की निरंकुश राजनीति के सबसे बड़े अड्डे बन गए हैं!

इस सच्चाई पर उत्पीड़ित समाज के कितने नेताओं की नजर है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय नौकरशाही पर संपूर्ण वर्चस्व का एक बहुत संगठित और योजनाबद्ध प्रोजेक्ट चल रहा है! इस प्रोजेक्ट को काफी सफलता मिल रही है! जिस तरह टीवी-मीडिया में एक खास सोच और मिज़ाज के लोग जड़ जमा चुके हैं, ठीक उसी तरह कुछ समय बाद भारतीय नौकरशाही और एकेडमिक्स में भी उग्र मनुवादी-आग्रहों और विचारों के लोग छा जायेंगे! आरक्षण के प्रावधानों के लगातार कुंद किये जाने, क्रीमीलेयर का दायरा बढ़ाने, कथित आर्थिक-पिछडेपन आधारित नये आरक्षण-नियमों, उच्च शिक्षा और कोचिंग आदि के बेहद खर्चीला होते जाने से नौकरशाही में दलित-आदिवासी-ओबीसी और (अन्य समुदायों के भी) तरक्कीपसंद लोगों की संख्या और कम होती जायेगी!

आप इस भयावह तस्वीर की कल्पना कीजिए, जो जल्दी ही असलियत बनने वाली है! आजादी के पहले और उसके बाद हमारी नौकरशाही कभी सुसंगत और समावेशी नहीं रही! पर उसके चरित्र में और ज्यादा नकारात्मक बदलाव होने जा रहे हैं! ‘हिन्दुत्वा-राष्ट्र’ के लिए नये ढंग की नौकरशाही भी तो चाहिए!

हम बोलेंगे तो बोलेगा कि बोलता है….!

एक सज्जन का कहना है कि भूमिहारों के बाद यादव सबसे बड़े जातिवादी हैं। उनके ज्ञान से घनघोर असमति है। बिहार की राजनीति का एक बड़ा और लंबा दौर कांग्रेस के शासन में बिहारवासियों ने देखा।

कांग्रेस में सीएम पद के लिए राजपूत और भूमिहार खेमा खुलकर क्रमश: अनुग्रह नारायण सिन्हा तथा श्री कृष्ण सिंह के पीछे गोलबंद हो जाता था। उस दौर के किस्सा कहानियों में बहुत कुछ दर्ज है।

बिहार में जातीय चेतना सबसे पहले किस्में आई? जातीय हितों की रक्षा के लिये सबसे पहले कायस्थों ने जातीय संगठन (कायस्थ महासभा ) बनाया फिर ब्राहण महासभा, ब्रह्षि महासभा (भूमिहार) , क्षत्रीय महासभा, यादव महासभा, लव-कुश यानी कुरी कोरी बिरादरी की जातीय सभा। जातीय गोलबंदी के शीर्ष सोपान पर कौन बिराजमान है? इस नजरिया से कायस्थ सबसे बड़े जातिवादी हुये।

इसी से जुड़ा आलेख प्रभात खबर के दीपावली विशेषांक पत्रिका के 1993 अंक में प्रकाशित हुआ था। जो बिहार की समाजार्थिकी व अन्य पहलू पर रौशनी डालता है। यह आलेख दिवंगत अशोक सिन्हा जी का लिखा है। बिहार की सरकारी नौकरियों ( राजपत्रित/ अराजपत्रित) में जातीय भागीदारी का सरकारी डेटा भी उन्होंने दिया है।

बहरहाल, ऐसे महानुभवों से यही कहना है कि वे इस वहम से बाहर निकलें। जो पावर में आता है वह अपनी बिरादरी वालों, शुभ चिंतकों, हितैषियों को पद/ ओहदा देता है। यह नई बात नहीं है। नेहरू के समय में ब्राहणों का रूतबा किसी से छुपा है? इंदिरा युग या राजीव युग में भी।

यही बात मुलायम-मायावती -लालू प्रसाद के बारे में भी कही जा सकती है। पिछड़ों-दलित अफसरों को आगे किया। जिन पदों पर वे कभी बैठ नहीं सकते थे, उन पदों को शुशोभित किया। मोदी सरकार के कितने सचिव या प्रमुख ओबीसी/दलित हैं। नग्नय।

महंत आदित्यनाथ क्या यूपी में ठाकुरवाद नहीं कर रहे हैं? जिले के अफसरों, पुलिस पदाधिकारी की सूची बताने के लिये कम है क्या? सत्ता का अपना चरित्र होता है, लेकिन भारत जैसे पिछड़े समाज में जाति ही सत्ता की धुरी है। इसे विलगाकर गोबर पट्टी में कोई सत्तारूढ़ नहीं हो सकता। अकादमी उच्च शिक्षा के अंदर भी जातिवाद है। बहस लंबी हो जायेगी। प्रगतिशीलता के तकाजे पर ऐसी सोच रखने वालों की बात खरी नहीं उतरी। हम बोलेंगे तो बबूला कि बोलता है…!

मूलतः यही ब्राह्मणवाद है जो छुपकर हर जगह घुसा रहता है, चाहे वह प्रशासन हो,न्यायपालिका और मीडिया हो या राजनीति किसी को समझ नहीं आ रहा है, इसके लिए जनांदोलन क्यों नहीं बन रहा है/खड़ा हो रहा है। जिसको मारकर पूर्ण ब्राह्मणवाद के जुमले और झूठे हिंदुत्व ने सब कुछ तहस नहस कर दिया है ?

जिन्हें हम अशिक्षित या कम शिक्षित समझते हैं, वे तमाम चीजें समझते हैं। नहीं समझते हैं,तो वे जो डिग्रीधारी है, सूटबूट में चमकते हैं, जिनके पेट भरे हुए हैं। दरअसल, यह तबका बहुत बड़ा धूर्त है। इसे समाज से नहीं,जाति या वर्ग से भी नहीं, केवल और केवल खुद से मतलब रहती है। यह तबका बड़ी आसानी से बेझिझक किसी के भी पायताने बैठ जाता है। अपने मामुली या बड़े कार्य के लिए तलवे भी चाटने में इसे कोई झेंप नहीं होती। ये इतने लालची होते हैं कि इन्हें जूठन भी मिल जाए तो गदगद हो जाते हैं। इसलिए, ऐसे लोगों के बारे में कुछ भी कहना अपना समय जाया करना है।

Published by Cow

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