JNU और IIT&IIM

JNU बनाम IIT-IIM

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JNU छात्रों के आन्दोलन के बीच कुछ लोग IIT-IIM का जिक्र लेकर आ गये हैं कि वहां की फीस तो JNU के मुकाबले कई सौ गुना अधिक है, फिर भी वे लोग आन्दोलन नहीं करते। वे लोग क्यों आन्दोलन नहीं करते यह बात बाद में, पहले यह कहना चाहूंगा कि उन लोगों को भी विरोध और आन्दोलन करना ही चाहिये, क्योंकि फीस की जो मौजूदा व्यवस्था है उसमें अब मजदूर तबके से आने वाला कोई भी बच्चा बिना कर्ज लिये पढ़ाई नहीं कर सकता।

हमारे जमाने तक IIT की फीस इतनी कम हुआ करती थी कि हमें समझाया जाता था, बस कम्पिटीशन निकाल लेना है, फिर तो जीवन सेट। अब इसी IIT से पासआउट बच्चे रेलवे के फोर्थ ग्रेड की नौकरी तलाश रहे हैं।

IIT और IIM की फीस तब बढ़ी जब देश में बाजारवाद उफान पर पहुँच गया और माना जाने लगा कि यह पढ़ाई नहीं, एक तरह का इनवेस्टमेंट है। बच्चों पर पैसे लगाईये और उसका कैरियर सेट। जब यहां से पास करने वाला बच्चा प्लेसमेंट में ही लाखों के पैकेज हासिल कर लेगा तो आप क्यों नहीं कुछ लाख रुपये का इनवेस्टमेंट कर सकते हैं। तो फिर गरीब अभिभावक भी कर्ज लेकर मोटी फीस चुकाने लगे, फिर स्टूडेंट लोन का भी कांसेप्ट आ गया।

आप समझ लीजिये कि जिस रोज स्टूडेंट लोन का कांसेप्ट आया था, उसी रोज से शिक्षा के बाजारीकरण कज शुरुआत हो चुकी थी। फिर धड़ाधड़ प्राइवेट इंजीनियरिंग और मैडिकल collage खुलने लगे। आपके बच्चे में मेरिट नहीं है, कोई बात नहीं, आपके पास पैसे हैं न। बच्चे को इन्जीनियर या डॉक्टर जो चाहे बना लीजिये। अब तो डाक्टरी पढ़ने में एक करोड़ से अधिक का खर्चा आ रहा है। रूस और चीन के मेडिकल कॉलेज यहां आकर प्रचार कर रहे हैं कि हम तो सस्ते में पढ़ा देंगे, हमारे पास आ जाईये।

इधर प्राइवेट कॉलेजों के फीस स्ट्रक्चर को दिखा कर सरकार कहती है कि हम ही क्यों सस्ते में पढायें। लिहाजा सरकारी हो या प्राइवेट, उच्च शिक्षा कमोबेस इनवेस्टमेंट बन कर रह गयी है। अब जिनके पास पैसे हैं, वे बच्चों को इन्जीनियर डॉक्टर बनायेंगे। जो गरीब हैं, वे बीए एमए करके 10-15 हजार की नौकरी करेंगे। या फिर 50 लाख का स्टूडेंट लोन लेकर दस साल कर्ज उतारते रहेंगे।

तो समझिये कि IIT-IIM में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिता ने अपने बच्चों के करियर में इन्वेस्टमेंट कर रखा है और इन्वेस्टर कभी भी विद्रोह नहीं करता। उसका काम अपने इनवेस्टमेंट से रिटर्न हासिल करना है और जो विद्रोह करता है, उसका कैरियर अनिश्चित हो जाता है। इसलिये अगर कोई IIT-IIM वाला सोच भी ले कि आन्दोलन करना है, उसके माता पिता झट से निर्देश जारी कर देते हैं, चुपचाप पढ़ाई पर ध्यान दो। याद नहीं कि हमने तुम पर कितना इन्वेस्ट किया है। हालांकि इतने प्रेशर के बावजूद IIT-IIM के बच्चे विद्रोह नहीं करते होंगे यह लगता नहीं। युवा मन कब इन चीजों को मानता है, हां कम करते होंगे।

हमने तो नवोदय जैसे स्कूल में भी आन्दोलन किया था, जहां सब कुछ मुफ्त है। पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी में मोटा इन्वेस्टमेंट करने का अफसोस आज भी है|

मगर जो युवा मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार कर दिये गये हैं कि उनके मां बाप उन पर लाखों का इनवेस्टमेंट कर रहे हैं, वे जरूर आन्दोलन का रिस्क उठाने में कतराएंगे। उन्हें तो येन केन प्रकारेन इनवेस्टमेंट के बदले में मुनाफा कमाना है। हालांकि लाखों की फीस उन्हें या उनके मां बाप को चुभती नहीं होगी, ऐसा सोचना गलत है। मगर उनके दिमाग में यह बात बिठा दी जाती होगी कि कोई नहीं, अभी पैसा लगाओ, बाद में बच्चा कई गुना रिटर्न लाएगा। सो वे चुप रह जाते होंगे। खूब मेहनत करके पैसे कमाते होंगे और बच्चों की फीस में सब खर्च कर देते होंगे।

धीरे धीरे हर भारतीय की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई लिखाई में खर्च होने लगा है। खास कर प्लस टू के बाद। लोग बाग खास तौर पर इसके लिए पैसा जमा करते हैं। पहले कोचिंग की फीस, फिर संस्थानों की फीस। एक बच्चा अगर साधारण स्तर की उच्च शिक्षा भी हासिल करे तो 10 से 15 लाख खर्च हो जाता है। होस्टल का तो कंसेप्ट ही खत्म हो रहा है। हर बड़े शहर में छात्रों के लिए प्राइवेट लौज और पीजी की भरमार है। अब तो बैंक इसके लिए फ्यूचर प्लान भी लेकर आ गये हैं।

मगर इस इन्वेस्टमेंट का नतीजा क्या है? लड़कों के मामले में मां बाप पहले तो भरपूर दहेज वसूलते हैं कि हमने अपने बेटे को इतना खर्च करके क्या इसी लिए पढ़ाया? फिर अगर बच्चे की सरकारी नौकरी लग गयी तो वह भ्रष्टाचार करने लगता है, इनवेस्टमेंट का अधिक से अधिक रिटर्न चाहिये। प्राइवेट नौकरी मिली तो कम्पनी के लिए बेइमानी करता है, सौ तरह के धतकर्म करता है कि जल्दी से आगे बढ़े। मेडिकल प्रोफेशनल अपना रिटर्न कैसे हासिल करते हैं यह किसी से छिपा नहीं। कुल मिलाकर शिक्षा का यह बाजारीकरन एक डरपोक, अवसरवादी और भ्रष्ट समाज पैदा करता है। हमें बेइमानी का रास्ता दिखाता है।

अगर संक्षेप में कहें तो आज के दौर में IIT और IIM एक अवसरवादी नौकर तैयार करने की फैक्टरी बन गयी है, इसलिये वहां विरोध और आन्दोलन कम होते हैं, जबकि JNU अभी भी एक सचेतन नागरिक तैयार करने का केन्द्र हैं इसलिये वहां के छात्रों में गलत को समझने और उनका विरोध करने का विवेक बचा है। जबकि सरकार पूरे देश से स्वविवेकी नागरिकों को खत्म कर, लोगों को अवसरवादी नौकर में बदल देना चाहती है। विवि की फीस वृद्धि इसी का नमूना है।

संजीव कमल

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Published by Cow

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